Thursday, July 30, 2009

गायत्री देवीः जयपुर की पहली महिला जो चलाती थीं कार

गायत्री देवी को कारों का शौक था और वे खुद अपनी कार चलाना पसंद करती थीं। खासतौर पर 50 के दशक में वे अपनी लाल रंग की ओपन स्पोर्ट्स कार में खुद ही जयपुर की सैर पर निकल जाती थीं। हालांकि यह रूढ़िवादी जयपुर के लिए एक बिलकुल नई बात थी पर धीरे-धीरे लोगों ने इसे स्वीकारा और उन्हीं की देखा-देखी कुछ और महिलाओं ने भी गाड़ियां चलानी सीखी। लेखिका और रावतसर घराने से संबंधित लक्ष्मी कुमारी चूंडावत बताती हैं कि पचास के दशक में उनके और महारानी गायत्री देवी सहित जयपुर में कुल जमा पांच-छह महिलाएं ही थीं, जो कार चलाती थीं।

खूबसूरती और वैभव की राजमाता- गायत्री देवी

जयपुर की पूर्व राजमाता गायत्री देवी का जन्म इंग्लैंड में 23 मई 1919 को हुआ था। रानी इंदिरा देवी और महाराज जितेन्द्र नारायण भूप बहादुर की पांच संतानों में वे चौथी थीं। कूच बिहार की राजकुमारी गायत्री देवी को जन्म के समय नाम दिया गया था आयशा, लेकिन ज्योतिषियों की राय पर उनका नाम गायत्री रखा गया। गायत्री देवी ने लंदन, स्विट्जरलैंड, कूचबिहार और शांति निकेतन में शिक्षा ली। गायत्री देवी का रुझान शिक्षा के साथ-साथ स्पोर्ट्स एक्टिविटीज में भी था।

गायत्री देवी : साढ़े तीन लाख वोटों के अंतर से जीतीं

वैसे तो गायत्री देवी अपने जीवन से इतनी प्रसन्न थीं कि उन्होंने कभी राजनीति में आने के बारे में नहीं सोचा। लेकिन भारत की आजादी के बाद रजवाड़ों को खत्म कर दिया गया था। कांग्रेस का दबदबा लगातार बढ़ता जा रहा था, ऐसे में उन्होंने सी. राजगोपालाचारी की स्वतंत्र पार्टी ज्वाइन की और 1962 में अपने पहले ही चुनाव में साढ़े तीन लाख वोटों के अंतर से जीतीं। इसके लिए उनका नाम गिनीज बुक ऑफ वल्र्ड रिकॉर्ड में भी दर्ज किया गया। 1965 में सवाई मानसिंह को स्पेन का राजदूत बनाया गया और गायत्री देवी भी कुछ सालों के लिए स्पेन चली गईं। इसके बाद वह फिर भारत लौटीं और राजनीति में सक्रिय हो गईं और 1967 में फिर लोकसभा चुनावों में वे भारी बहुमत से जीतीं।

दुनिया की सबसे खूबसूरत महिलाओं में शुमार

पूर्व राजमाता गायत्री देवी को आज भी खूबसूरती और गरिमा का पर्याय माना जाता है। उन्हें इस सदी की दस सबसे खूबसूरत महिलाओं में गिना जाता है। हालांकि वे अपनी खूबसूरती और गरिमा को अपनी मां की देन बताती थीं। पेस्टल शिफॉन की साड़ी और गले में मोतियों की माला बस यही उनकी पहचान थी और गरिमामयी शख्सियत के आभूषण।

गायत्री देवी : मिलना सवाई मानसिंह से

सवाई मान सिंह द्वितीय से उनकी मुलाकातें कूच बिहार, लंदन और कई शहरों में होती रही थीं। वे गायत्री देवी के पारिवारिक मित्र थे और उनके बड़े भाई के अच्छे मित्र भी थे। जब गायत्री देवी 14 साल की थीं, तभी सवाई मानसिंह ने कह दिया था कि गायत्री से विवाह रचाएंगे। हालांकि उनकी पहले से ही दो पत्नियां थीं। किशोर गायत्री के मन पर भी सवाई मानसिंह छा चुके थे, इस स्पोर्टी महिला को पोलो का यह युवा खिलाड़ी भा चुका था। लंदन में उनकी मुलाकातों के दौरान उनकी मुहब्बत परवान चढ़ी और 1940 में 21 साल की आयु में गायत्री देवी का विवाह सवाई मानसिंह द्वितीय से हुआ।

जाना सवाई मान सिंह और प्रिय पुत्र जगत सिंह का

1970 में इंग्लैंड में पोलो खेलते हुए उनके पति जयपुर के पूर्व महाराज सवाई मान सिंह को हार्ट अटैक हुआ और वे चल बसे। यह झटका गायत्री देवी सह नहीं सकीं और अकेलेपन ने उन्हें तोड़ दिया। हालांकि उन्होंने अपना पूरा ध्यान अपने इकलौते पुत्र जगत सिंह पर लगाया। जगत सिंह इंग्लैंड में रहकर पढ़ाई कर रहे थे और वहीं वह थाईलैंड की राजकुमारी प्रिया से मिले।

गायत्री देवी को आशा थी कि यह शादी उनके जीवन में फिर से खुशियां लाएगी, लेकिन जगत सिंह और प्रिया की शादी लंबी नहीं चली और वे अपने दोनों बच्चों देवराज और लालित्य को लेकर थाईलैंड चली गईं। जगत सिंह यह सह नहीं सके और उन्होंने शराब का सहारा लिया। 1997 में गायत्री देवी के पुत्र जगत सिंह की भी मृत्यु हो गई।

यह उनके जीवन का सबसे दुखदायी दौर था, जब सभी प्रियजन उनसे बहुत दूर थे और वे बहुत अकेली। उनसे मिलने वाले नजदीकी बताते हैं कि जगत सिंह की मौत ने गायत्री देवी को इतना कमजोर कर दिया कि वे ज्यादातर समय मौत और जाने की बात करने लगीं। जगत की मौत के बाद वे जिन्दगी से बेहद निराश हो गईं।

गायत्री देवी : अच्छी शिकारी और खिलाड़ी

गायत्री देवी ने अपनी आत्मकथा में स्वीकारा है कि वे बेहद टॉमब्यॉइज थीं, उनके शौक लड़कों जैसे थे। शिकार करना, घुड़सवारी, कई तरह के खेल खेलना और स्वीमिंग। उन्होंने बाघ का पहला शिकार 12 साल की उम्र में किया था। इसके अलावा वे टेबल टेनिस, बैडमिंटन की भी अच्छी खिलाड़ी थीं।