Thursday, July 30, 2009

उनके दिल में बसा था जयपुर

जयपुर. गायत्री देवी, जयपुर की महारानी थीं, इसलिए राजमाता नहीं थीं। वे राजमाता इसलिए भी थीं क्योंकि वे बड़ी उम्र में भी अपने राज की जनता यानी जयपुरवासियों के हर दुख-दर्द में शरीक रहीं। राजमाता के लिए वर्ग भेद कोई मायने नहीं रखता था। यह उनके ऐसे कदमों से झलका, जब वे लोगों के संकट की घड़ी में न केवल कालोनियों और गली-मोहल्लों में पहुंची, बल्कि उन्होंने कच्ची बस्तियों की भी राह पकड़ी।

सबसे ताजा घटना 20 फरवरी 2008 की है जब राजमाता गायत्री देवी महल छोड़ मोती डूंगरी किले के पीछे पहुंचीं और जमीन पर हुए अतिक्रमण के खिलाफ कच्ची बस्ती के लोगों के धरने पर शरीक हो गई। राजमाता संभवत: किसी धरने में पहली बार ही बैठी थीं। गायत्री देवी का कहना था कि यह जमीन उन्होंने बेची ही नहीं। गौरतलब है कि मोती डूंगरी किले के पीछे स्थित बस्ती में 18 हजार वर्ग जमीन पर डायमंड हिल्स के नाम से एक कालोनाइजर ने प्लॉट काट दिए।

वे राजनीति में रहीं और समाज सेवा में रहीं, लेकिन अधिक उम्र होने पर भी उन्होंने लोगों का साथ नहीं छोड़ा। स्कूलों के होली या दिवाली के आयोजनों में वे ऐसे शरीक हुईं कि जैसे स्कूल की टीचर हों। कुछ साल पहले एमजीडी स्कूल के बच्चों के साथ होली खेलकर वे काफी खुश थीं। 10-12 साल पहले यानी करीब 80 वर्ष की उम्र में वे एसएमएस इन्वेस्टमेंट मैदान पर हैंडलूम प्रदर्शनी में पहुंची। उन्होंने किसी भी समाज और संगठनों के निमंत्रण को विशेष परिस्थिति के अलावा कभी खारिज नहीं किया। राजमाता वहां जाती और न केवल आतिथ्य निभाती बल्कि लोगों से आमजन के रूप में मिलती-जुलती और दुख-दर्द सुनतीं।

पर्यावरण प्रेमी भी

वर्ष 2003 में जब झाड़खंड महादेव मंदिर के बाहर करीब दो सौ साल पुराने पेड़ काटे जा रहे थे तो कुछ सामाजिक संगठनों ने क्वींस रोड पर धरना दिया था। राजमाता पेड़ों का दर्द सह नहीं सकीं और धरने पर पहुंच गई। इसी प्रकार, चार दरवाजा के बाहर भी एक पार्क में कटते पेड़ों के खिलाफ धरने पर पहुंची। राजापार्क के निवासियों ने बताया कि राजमाता 13 जनवरी 1999 को वे राजापार्क पहुंची और उन्होंने बड़ी संख्या में उन बुजुर्र्गो को सम्मानित किया जो पाकिस्तान छोड़कर यहां आ गए थे। गायत्री देवी ने ही उन्हें यहां बसाया था। साहित्यकार डॉ. के.के. रत्तू का कहना है कि वे राजशाही का लोकशाही चेहरा थीं।

बहुत कम लोग ऐसे होते हैं जिन्हें इस रूप में जाना जाता है। जयपुर ने राजमाता को चुनकर संसद में भेजा तो जनता से बीच से गिरधारीलाल भार्गव को भी चुनकर भेजा। यह लोकतंत्र के लिए मिसाल है। समाजसेवी दामोदर हल्दिया का कहना है कि जब राजमाता चुनाव लड़ रही थीं तो उस दौरान मैं चुनाव संचालन में भागीदार बना। उनके साथ हुई बातचीत से पहली बार लगा कि राजपरिवार की सदस्य होने के बावजूद वे जनता के प्रति कितनी सहृदयी थीं।

राजमाता से मेरा पारिवारिक रिश्ता : शेखावत

राजमाता के निधन से जिन लोगों को व्यक्तिगत आघात पहुंचा उनमें देश के पूर्व उप राष्ट्रपति भैरोसिंह शेखावत भी शामिल हैं। राजमाता के निधन की खबर सुनने के बाद दु:ख प्रकट करते हुए शेखावत ने कहा कि उनसे मेरे बेहद आत्मीय और पारिवारिक रिश्ते थे। वे जीवन में कई आदर्श और मूल्यों के प्रति पूरी तरह समर्पित रहीं। उन्होंने राजस्थान में महिलाओं की शिक्षा के लिए विशेष प्रयास किए।

शेखावत ने कहा कि यह उनका आकर्षक व्यक्तित्व और कृतित्व ही था जिसकी बदौलत उन्हें पूरी दुनिया में ख्याति हासिल हुई। उन्होंने कहा कि सभी देशों के राष्ट्राध्यक्ष और महत्वपूर्ण व्यक्ति राजमाता का आदर करते थे। शेखावत ने उनके जयपुर के सांसद के रूप में उल्लेखनीय कार्यकाल को भी याद किया और कहा कि उन्होंने अपने काम की बदौलत सबका दिल जीता। उनकी वजह से पूरे राजस्थान का सम्मान बढ़ा। शेखावत ने कहा कि राजमाता के निधन की खबर से मुझे गहरा आघात लगा है।

आशीर्वाद में कमी नहीं रखीराज्यपाल एस. के. सिंह ने अपने गायत्री देवी के निधन पर गहरी संवेदना प्रकट करते हुए कहा कि गायत्री देवी ने महिला शिक्षा, महिलाओं के खेलकूद और राज्य ही नहीं देश भर की महिलाओं को आगे लाने के लिए कार्य किया। उनका व्यक्तित्व, उनका सौंदर्य और उनकी राज्य निष्ठा विश्वभर में चर्चित रही। अभी कुछ समय पूर्व ही उन्होंने उन्हें (राज्यपाल) और उनकी पत्नी मंजूसिंह को एमजीडी विद्यालय के जलसे में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया था। जब से वे जयपुर में आए राजमाता ने आशीर्वाद में कमी नहीं रखी।

जयपुर के समग्र विकास में योगदान

विधानसभा अध्यक्ष दीपेन्द्र सिंह शेखावत ने कहा कि गायत्री देवी का जयपुर के खेल, सामाजिक, राजनीतिक एवं शैक्षिक जगत खास तौर पर बालिका शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान रहा ।

एक युग का अंत
पर्यटन मंत्री बीना काक ने कहा कि उनके निधन से एक युग का अंत हो गया है। ऐसे युग का जिसने समाजसेवा, राजनीति और फैशन को नया आयाम दिया। वे हजारों के लिए रोल मॉडल थीं। बहुआयामी व्यक्तित्व की धनी राजमाता के निधन पर सभी स्तब्ध हैं। उद्योग मंत्री राजेंद्र पारीक ने कहा कि बालिका शिक्षा में उनके द्वारा किए गए प्रयास हमेशा याद किए जाएंगे।

लोकप्रिय और व्यवहार कुशल
भाजपा प्रदेशाध्यक्ष अरुण चतुर्वेदी ने कहा कि राजस्थान की जनता के लिए अपूरणीय क्षति है। गायत्री देवी सहृदयता व व्यवहार कुशलता के लिए लोकप्रिय थी। विधानसभा में भाजपा के उपनेता घनश्याम तिवाड़ी ने कहा कि जयपुर ने अपनी पहचान खो दी है। गायत्री देवी ने व्यक्तित्व से अंतर्राष्ट्रीय पहचान बनाई और राजपरिवार से जुड़ी होने के बाद भी आम आदमी से जुड़ी रहीं। महापौर पंकज जोशी और उपमहापौर विमल कुमावत ने कहा कि पूर्व राजमाता सहृदयी सहिष्णु महिला थीं। वे प्रदेश में ही नहीं संपूर्ण विश्व में लोकप्रिय थीं।

अपनों की नजर में..

शिक्षा को नई रोशनी दी
रघुनाथ सिंह. गायत्री देवी के एडीसी और सरदार इन वेटिंग
बचपन से ही गायत्री देवीजी को देखता आ रहा हूं। मुझसे पूर्व मेरे पिताजी कर्नल केसरी सिंह भी बरसों उनके एडीसी रहे। गायत्री देवी को मैंने महारानी से राजमाता तक का सफर तय करते देखा है। उम्र के अंतिम पड़ाव तक वे जहां भी गई उनकी कुलीनता और शालीनता का हर कोई कायल हो जाता था। वे शुरू से ही प्रगतिशील विचारों की पक्षधर रहीं, उन्हें पूर्व महारानियों की भांति पर्दे में रहना रास नहीं आया। वे महाराज के साथ सभा-समारोह में जाती थीं, घुड़सवारी करतीं, टेनिस व बैडमिंटन खेलतीं तथा कई बार शिकार के लिए भी निकल पड़ती थीं।

उनके कृतित्व और व्यक्तित्व की वजह से जयपुर रियासत के परंपरागत परिवारों को भी रोशनी मिली। उन्होंने जयपुर में शिक्षा को नई रोशनी दी। उन दिनों जब महिलाओं को उच्च शिक्षा के पर्याप्त अवसर नहीं थे राजमाता साहिबा ने महाराजा साहेब (सवाई मानसिंह द्वितीय) के प्रोत्साहन से 1943 में जयपुर में एमजीडी स्कूल की स्थापना की। मैं उस समय 12-13 साल का था। मुझे आज भी याद है उन्होंने स्कूल की योजना सबसे पहले मेरे पिताजी को बताई। उस समय महाराजा साहेब के निजी स्टाफ और जागीरदारों की बेटियों को प्रवेश दिलवाकर इसकी शुरुआत की गई।

लगा जैसे मां को खो दिया
जी.डी. बख्शी. कई वर्षो तक एमजीडी स्कूल की प्रिंसिपल रहीं
मेरे लिए राजमाता सबकुछ थीं। उन्होंने मुझे हमेशा प्रोत्साहित किया। मुझे स्वतंत्र रूप से स्कूल हवाले कर दिया। कहतीं, यह तुम्हारा स्कूल है, इसे कैसे संभालना है, तुम जानो। वे राजपरिवार तक सीमित नहीं रहीं। राजनीति, समाज, खेल हर जगह वे पहुंचीं। महिलाओं के उत्थान के लिए आगे बढ़ीं। उनका हमें गाइड करने का तरीका अनूठा था। मैंने तो जैसे एक और मां खो दी। जब मैं उनकी अंग्रेजी किताब ‘प्रिंसेस रिमेम्बर्ड’ का हिंदी अनुवाद कर रही थीं, यानी मेरी स्मृतियों को रूप दे रही थी तो उनके साथ बिताया हर पल अब आंखों के सामने तैरने लगा।

एक बार मैं अनुवाद के दौरान उनसे महाराजा सवाई मानसिंह जी के बारे में कुछ पूछ रही थी, तो कुछ देर बाद मुझे लगा कि वे मेरी बातों से दूर कहीं और चली गई हैं। वे खो गई थीं महाराज की यादों में। उनके हर कदम में सीख की शिक्षा थी। स्कूल की 50वीं वर्षगांठ पर एक नाटक खेला गया, महारानी का सपना। वो राजमाता के जीवन पर ही था। रिहर्सल के दौरान ही वे बार-बार पूछ चुकी थीं, महारानी किसे बनाया है, क्या वो निभा पाएगी रोल? जब मंचन हुआ तो वे महारानी बनी छात्रा को और उसके अभिनय को देख बस जैसे उछल ही पड़ीं।

मुझसे पूछा, तुम्हारे आंसू नहीं आते?
के.एन.जैन. गायत्री देवी के कानूनी सलाहकार
वर्ष 1967 में जयपुर के जौहरी बाजार में हुए गोलीकांड के बाद पूर्व राजमाता गायत्री देवी जब पीड़ित परिवारों का हाल जानने गईं, तो उनकी आंखों से आंसू छलक पड़े थे। तब मैं साथ था। जैसे ही मैंने उन्हें ढांढस बंधाना चाहा, वे नाराज हो गईं। उन्होंने मुझसे पूछा, क्या इतना दुख देखकर भी तुम्हारे आंसू नहीं निकलते?

यह पहला मौका था जब गायत्री देवी ने ऐसे तेवर में बात कही। गायत्री देवी पोलो खेल की शानदार कमेंटेटर भी थीं। पूर्व महाराजा मानसिंह जब पोलो खेलते थे तो अधिकतर मौकों पर वे कमेंट्री किया करती थीं। उनका अंग्रेजी का ज्ञान अच्छा था, हिंदी ज्यादा बेहतर नहीं थी। चुनाव के दौरान राजमाता खुद अपना भाषण अंग्रेजी में लिखकर देती थी, जिसे बाद में वे हिंदी में अनुवाद करके देते थे। दिखावे की राजनीति से पूर्व राजमाता को बेहद नफरत थी।

उन्होंने सिखाया जीने का अंदाज

स्नेह गोविंद सिंह. रिश्ते में गायत्री देवी की देवरानी
मुझे वे पल हमेशा याद रहते हैं। कैसे भुला सकती हूं वो साथ जो मैंने उनके साथ मेरी शादी के बाद से बिताए हैं। मैं हर समय उनसे सीखती रही। राजस्थानी भाषा, संस्कृति, पहनावा, तीज-त्यौहार की परंपरा और घर के रीति रिवाज, यानी सब कुछ। वे हमें राजस्थानी रिवाज के बारे में बताती, कहती, कपड़े ऐसे पहनने चाहिए, बड़ों के सामने ऐसे व्यवहार करना चाहिए, ऐसे पूजा करो और अपना धर्म निभाओ।

जब मेरे पति कर्नल गोविंदसिंह का निधन हुआ, वे बार-बार पूछती, तू कैसी है, कोई तकलीफ तो नहीं। कोई बात हो तो बताना। वो कभी गुस्सा नहीं करती, नाराजगी भी जताती तो बात को मन में नहीं रखती थी। कह देती, यह बात ठीक नहीं है और सुधार हो जाता। फिर वही सब कुछ सामान्य। उन्होंने जो जयपुर को दिया, वह हर व्यक्ति याद करेग। लड़कियों और लड़कों की शिक्षा के प्रति वे काफी संवेदनशील थीं। जब बच्चों की पढ़ाई की बात आती, वे उच्च और संस्कारित शिक्षा पर जोर देती। एमजीडी और एसएमएस स्कूलों के माध्यम से उन्होंने ऐसा ही देने का प्रयास किया।

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